देश में सार्वजनिक क्षेत्र में 50 प्रतिशत और निजी क्षेत्र में 70 प्रतिशत ऐसे मजदूर हैं जो कांट्रैक्ट पर काम करते हैं। इन कांट्रै्क्ट कर्मियों यानि ठेका मजदूरों की हालत बेहद खराब है।सरकार के संरक्षण में सारे श्रम कानूनों को दर किनार कर यह प्रक्रिया चलायी गयी।इन ठेका मजदूरों की मजदूरी बेहद कम है, उसमें भी न्यूनतम मजदूरी तक इन्हें नहीं मिलती। हम आपसे जानना चाहते है कि आखिर क्या कारण है कि इन ठेका मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तक इन्हें नहीं मिलती। श्रम कानून द्वारा मज़दूरों के स्वास्थ्य और कल्याण हेतु समुचित व्यवस्था सुनिश्चित कराने के बावजूद क्यों इन्हें ये सुविधा नहीं मिल पा रही है ? सरकार द्वारा 8 घण्टे की कार्य की अवधि बनाने के बावजूद क्यों हमारे मज़दूर 10 से 12 घंटे काम करने को मज़बूर है ? साथ ही हमारे श्रम कानून द्वारा इन मज़दूरों से सम्बंधित जितनी भी योजनाए बनायीं गयी है, क्या वह कारगर साबित हो रही ? सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत ठेका मजदूरों के हालात को और उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है ?