दोस्तों, ईंधन मानव-सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता हैं।और इसी की खोज पर हम कोयला,पावर -प्लांट, और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित रहते है।कोयला खदानों और थर्मल पावर-प्लांट से बनने वाले ईंधन से मानव समाज ने काफी उन्नतियां प्राप्त की है परन्तु हम अपने भौतिक सुखों को प्राप्त करने के लिए, इन प्राकृतिक श्रोतों का भयावह इस्तेमाल करते जा रहे हैं।और विकास की इस अंधाधुंध दौड़ में प्रदुषण नामक एक खतरनाक दैत्य को भी जन्म देते जा रहे हैं। प्रदुषण को कम करने के लिए सरकार के कुछ तय मानक है लेकिन क्या सरकार के तय मानकों के अनुसार, आज पावर-प्लांट और कोयला खदाने प्रदुषण को नियंत्रित कर रही है? क्या भारत सरकार का पर्यावरण प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड महज हाथी का दांत बन कर रह गया है? क्या विकास की इस तेज़ दौड़ में हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ किए जा रहे है? साथ ही, क्या ये ज़िम्मेवारी सिर्फ सरकार की है? अपने स्तर से हम प्रदुषण को रोकने के लिए और क्या पहल कर सकते है? स्वच्छ ईंधन के बारे में आप की क्या राय है?
