उत्तरप्रदेश राज्य के बस्ती ज़िला से 50 वर्षीय अरविन्द श्रीवास्तव मोबाइल वाणी के माध्यम से कहते है कि अधिकतर महिलाएँ अपना समय कृषि कार्यों में देती है और महिलाओं को यह हक़ नहीं होता है कि उनका अधिकार जमीन में होना चाहिए। जहाँ पट्टे की बात होती है तो पुरुष अपने नाम ही पट्टा करवाता है। पैतृक संपत्ति में भी बेटों को अधिक हिस्सा दिया जाता है। लड़ाई लड़ने के बाद ही कुछ प्रतिशत महिलाओं को जमीन में मालिकाना हक़ मिला हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में न के बराबर महिलाओं के नाम जमीन है वहीं शहरी क्षेत्रों में लोग महिलाओं के नाम जमीन खरीदते है क्योंकि उसमें स्टाम्प छूट मिलता है। लेकिन जमीन में नाम के बावजूद महिलाओं को मालिकाना हक़ समाज द्वारा नहीं दिया जाता है। महिलाओं को उनके नाम जमीन रहने पर भी उनका स्वामित्व नहीं मिलता है।
