ठंड बढ़ने से गरीबों के पास ठंड से बचने का कोई साधन नहीं. न तन पर पूरे कपड़े हैं न खाने को अनाज है ठंड भूख से ठिठुर रहे झुग्गी झोपड़ियों वाली बस्तियों फुटपाथ पर बस स्टॉप पर रिक्शे पर या फिर किसी खुले मैदान में रात गुजार रहे गरीब इनके लिए कहा भगवान है गरीब एवं बेसहारों की परेशानी दिन प्रतिदिन बढ़ने से बढ़ते ही जा रही है कमजोर माली हालत के कारण वह गर्म कपड़े भी नहीं जुटा पाते ठंड के कारण रात गुजारना उनके लिए मुश्किल हो गया है वह कागज बीनकर व उन्हें जलाकर देह गरमाने की जुगत करते रहते हैं ऐसे में नगर निगम की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन गरीबों और फुटपाथ ई बेसहारों के लिए कमरों और अन्य गर्म कपड़ों के साथ-साथ समय-समय पर चौक चौराहों पर लकड़ियों की व्यवस्था करें इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए .