बाल विवाह मुक्त झारखंड अभियान की पिछली कड़ी में बात की गई थी, बाल विवाह से जुड़े क़ानूनी मुद्दों के बारे में। इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आज की कड़ी में यह जानने की कोशिश करेंगे की,बाल विवाह जैसी कुप्रथा का जड़ हमारे समाज की लिंग भेदभाव जैसी परम्पराओं में छुपी हुई है।क्योंकि लड़का-लड़की के बीच भेदभाव की परम्परा तो यह सिखाती है, की लड़कियां बोझ होतीं हैं और उनकी शादी करा कर जल्दी से इस बोझ से छुटकारा पाना है। लिंग भेद यानी किसी के लिंग के आधार पर उससे भेदभाव करना।लड़का और लड़की दोनों शारीरिक रूप से अलग-अलग प्रजाति के हैं, और यह फर्क प्रकृति ने अपने नियम से बनाए हैं।ताकि मनुष्य प्रजाति अपना वंश बढ़ा सके और इस धरती पर अपना अस्तित्व कायम रख सके। तो साथियों, आपके समुदाय में लड़का और लड़की में क्या बराबरी का दर्जा दिया जाता है।