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सतगुरू कबीर कहते है अखिल विश्व में प्रकृति और पुरूष अर्थात जड और चेतन दो तत्वों की सत्ता है। इन दोनो के गुण धर्मो से पृथक तीसरे तत्व की अनूभूति किसी को नही होती है। ग्रह हमारी प्रुथ्वी से करोड़ों किलोमीटर दूर आकाश में स्थित है और अपनी अपनी धुरी पर स्थित होते हुए निरंतर गतिशील है निज जड़ पिंड ग्रह मुनष्यों पर कुपित तथा टेढे कैसे हो सकते है फिर भी अज्ञान और भ्रम की महामहिमा में इन ग्रह्रों के चक्कर में सामान्य जन ही नहीं तो बडे-बडे विद्वान ज्ञानी, विज्ञानी, महात्मा, पंडित, तथा सिद्ध नामधारी भटक रहे है। आकाश में फैले ग्रह निरे जड़ है उनका मनुष्यों के सुख-दुख से कोई संबंध नहीं है। अतः उनका मनुष्य पर खुश या नाखुश होना सर्वर्था निराधार है। जरा सोचें यह ग्रह गैर हिंदूओं पर यह खुश या नाखुश क्यों नहीं होते हैं। जबकि गैर हिंदू भी इसी धरा पर रहते है।
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