हम पुरुष कभी अपने जीवन में अपनी परेशानियों को देखकर इनसे भागते नही है इनकी वजह ढूंढते है कि कमजोरियां कहां पर है लेकिन भी दर्द तो मर्द को भी होती है चाहे शरीर किसी की भी बनी हो , इंसान तो इंसान ही है । जिंदगी की अनुभवों से सीखने का आनंद और दूसरी ओर गलतियों पर खुद को कोसना भी जायज है क्योंकि इंसान तो इंसान ही है । उम्र के साथ अच्छी चीजों को जोड़ना और गुणा करने का सुखद पाना और दूसरी ओर बुरी चीजों को घटाना और भाग करना भी जिंदगी की गणित को मजबूत बनाती है क्योंकि इंसान तो इंसान ही है । समाज में औरतों के समक्ष रोना मर्दानगी का शाया बोलकर मजाक बना देते है और कहते हैं कि तुम तो एक मर्द हो और मर्द थोड़ी रोते है लेकिन मैं कह दूं की दर्द की कोई लिंग नही होती है क्योंकि इंसान तो इंसान ही है। हम मर्द जात इसीलिए भी अपनी आंसू छुपाते है क्योंकि हमें अपने परेशानियों से स्वयं लड़ना होता है हमारे कर्मों पर बहुत सारी उम्मीदें टिक्की हुई होती है क्योंकि रसायनों की अभिक्रिया में स्थितियों की बदलाव होती है न की भौतिक अवस्था में परिवर्तन आता है । हम मनुष्य न तो ऊर्जा बना सकते है और न ही ऊर्जा खत्म कर सकते है अर्थात् ऊर्जा की खर्च से ही ऊर्जा बनता है और उन ऊर्जा को अलग - अलग चीजों में इस्तेमाल किया जाता रहा
