झारखण्ड मे रघुवर सरकार के ने कुपोषण के खिलाफ लड़ाई लडने के लिए छः जिलों मे पोषण परामर्शी उर्फ पोषण सखी की बहाली की थी जिसमे योगदान देकर पोषण सखियों ने कोरोना काल जैसे महामारी मे भी अपने जान की परवाह ना करते हुए कुपोषण से लेकर कोरोना वैकसीनेशन तक सेवा भाव से अपनी सेवा प्रदान की लेकिन वर्तमान सरकार ने सता मे आते ही केन्द्र का हवाला देते हुए पोषण सखियों की बहाली को निरस्त कर दिया था, तब से लगातार पोषण सखी संघ चरणबद्ध आंदोलन पर हैं लेकिन सरकार कोई संज्ञान नही ले रही है । आज पोषण सखियों की स्थिति ठिक इस प्रकार हो गई है की धोबी का कुता न घर का न घाट का पोषण सखी बाट जोह रही है झारखंड सरकार का। अब इनके लिए उम्र सीमा भी निकल चुका है कि कहीं और योगदान की अपील की जाय। दरअसल देखा जाए तो झारखण्ड काले सोने समेत कई खनिजों और संपदाओं से युक्त है और बात करें यहाँ के नेताओं और विधानसभा सदस्यों की जिन्हें वी आई पी सुख सुविधाओं के साथ वेतनमान दिया जाता है तब सरकार का बजट नही गडबड होती लेकिन पोषण क्षेत्र मे आमलोगों की सेवा हित कार्य मे हाथ बटा रही पोषण सखी सरकार पर भारी पड़ी। बात कुछ भी हो घिसना तो आम इंसान को ही पडता है। एक ओर जहां सरकार महिलाओं को समृद्ध और सुदृढ करने की बात करती हैं वहीं दूसरी ओर इनके मुँह से निवाला छिना जा रहा है।पारिवारिक समस्या और आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही पोषण सखियों का जीवन असमंजस मे है न आगे नाथ न पिछे पगहा,आकर अटके ऐसी जगहा। यह कहावत सटीक जान पड़ता है।