संस्कृति की अस्मिता की बात इतनी ही करें परंतु परंपराओं का अवमूल्यन हुआ है आस्थाओं का क्षरण हुआ है कड़वा सच तो यह है कि हम बौद्धिक दासता स्वीकार कर रहे हैं पश्चिम के सांस्कृतिक उपनिवेश बन रहे हैं और हमारी संस्कृति अनुकरण की संस्कृति है हम आधुनिकता के झूठे प्रतिमान अपनाते जा रहे हैं इसके लिए हमें पुणे एक बार स्वयं का और स्वयं की मानसिकता का अवलोकन और आकलन करना होगा ताकि हम अपनी संस्कृति अस्मिता को बनाए रख सकें