मानव एक सामाजिक प्राणी है मानव का सामाजिक बनने के पूर्व और सामाजिक बनने के बाद भी वह क्रोधित शिया लोग आदि दुर्गुणों से पीड़ित रहा है उसका संघर्ष अन्य प्राणियों से ही नहीं रहा बल्कि अन्य मानव से भी रहा है अतः ऐसे मानव व्यवहार जो समाज की व्यवस्थाओं के प्रतिकूल समझे गए हैं वह अपराध की श्रेणी में आते हैं प्राचीन काल में जब राज्य का विकास नहीं हुआ था तब अपराध और पाप एक दूसरे के पर्यायवाची माने जाते थे समय के साथ-साथ राज्य प्रकृति बदली और 70 निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथ में आने लगी इसी समय विधि को एक निश्चित रूप देने का कार्य प्रारंभ हुआ और विधि केवल धर्म पर आधारित न होकर समाज की सभ्यता सामाजिक मान्यताओं एवं सामाजिक विकास के विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हुई है
