जमुई जिला गिद्धौर प्रखंड के पतसंडा पंचायत में सदियों से दशहरा बड़े पैमाने पर मनाया जाता रहा है। यहाँ के सुप्रसिद्ध दुर्गा पूजा का आयोजन गौरवशाली परंपरा का नमूना है जो सैकड़ो सालों से अविराम अपने अस्तित्व की विशिष्ट उपस्थिति पूरे सूबे में दर्ज कराती रही है। गिद्धौर की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से दो ही पहचान है। एक यहां की पुरानी रियासत तथा दूसरा दुर्गा पूजा और दोनों की ही एक लम्बी परम्परा है। गिद्धौर राज रियासत के आठवें वंशज पूरनमल ने इलाके के सुप्रसिद्ध उलाई नदी के तट पर 1566 ई. में गिद्धौर के ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर गिद्धौर राज महल से पश्चिम में स्थित है। हालांकि इस दुर्गा मंदिर का जीर्णोद्धार कई बार कराया जा चुका है। लेकिन मूल संरचना लगभग वही है। यहाँ की प्रतिमा भव्य व सुंदर मानी जाती है। लोगों की जुबानी एक कहावत प्रचलित है कि ‘काली है कलकत्ते की, दुर्गा है पतसंडे की’, अर्थात माँ काली की पूजा का जो स्थान कलकत्ता में है, वही पतसंडा अर्थात गिद्धौर में माँ दुर्गा की पूजा का है। बता दे की उलाय नदी तट के पावन स्थल पर स्थापित गिद्धौर दुर्गा मंदिर में मां भगवती की प्रतिमा का विहंगम रूप देखने को मिलता है। जो भी श्रद्धालु भक्त सच्चे हृदय से मां पतसंडा को नमन कर अपनी मनोकामना मां के समक्ष रखता है। खबर सुनने के लिए ऑडियो क्लिक करें