रोजगार की तलाश में अपना घर, गांव और कस्बा छोड़कर किसी और राज्य में जाना अब लगभग आम सा हो गया है. हम अपने आसपास रोजाना ही ऐसे जाने कितने परिवारों से मिलते हैं, जिनका कोई अपना रोजगार की तलाश में दूर किसी महानगर में है और पीछे उसका परिवार राह तांक रहा है. दिहाड़ी मजदूरों की दयनीय दशा को देखकर केंद्र सरकार ने 1979 में इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन कानून बनाया था. जिसके अनुसार हर कारखाने के मालिक या खेतों के मालिक को आदेश दिया गया कि वह अपने यहां काम करने वाले मजदूरों का पंजीयन करे. उन्हें पहचान पत्र दें और उनके रहने का उचित प्रबंध करे और जरूरत पडने पर स्वास्थ्य सुविधाएं भी मुहैया करवाएं. लेकिन यह कानून किताबी जुमला बनकर रह गया. किसी ने भी इस आदेश को गंभीरता से नहीं लिया और यही कारण है कि कंपनियों के पास मजदूरों के स्थायी पते, नम्बर आदि भी नहीं हैं. कई बार ऐसा होता है कि काम के दौरान कोई हादसा होता है और मजदूर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं. कई बार तो उनकी मौत तक हो जाती है लेकिन परिवार वालों को समय पर खबर नहीं हो पाती. चुनावी मौसम में एक बार फिर पलायन और रोजगार का मुद्दा उठाया जा रहा है लेकिन उन परिवारों की दिक्कतों का क्या, जो मजदूर के चले जाने के बाद उसका परिवार झेलता है? तो हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या आपने अपने आसपास किसी मजदूर के परिवार को ऐसी परेशानियों का सामना करते देखा है? पलायन करने वाले मजदूरों के परिवार किस तरह की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं? यदि उनके साथ कोई हादसा हो जाता है तो क्या कंपनी के मालिक कोई मदद करते हैं? क्या स्थानीय प्रशासन ने उनकी सहूलियतों के लिए कभी कोई प्रयास किया?
