हिन्दी साहित्य में इतिहास और लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार बच्चन सिंह ने किया। हैदराबाद विवि के प्रो. गजेंद्र सिंह ने काशी विद्यापीठ में यह बात कहीं। वह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषा विभाग की तरफ से आयोजित 'हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन एवं दृष्टिबोध, सन्दर्भ बच्चन सिंह का इतिहास लेखन' विषयक दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन बोल रहे थे। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विख्यात चिंतक दीपक मलिक ने कहा कि बच्चन सिंह के बहुआयामी व्यक्तित्व ने इतिहास लेखन में साहित्य की अनेक नई भंगिमाओं को आवाज दी। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह ने इतिहास दृष्टि निर्माण की प्रक्रिया का विश्लेषण किया। दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता दिल्ली विवि के प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि आलोचक बच्चन सिंह ने रीतिकाल के श्रृंगार बोध जैसे पारंपरिक विषयों पर लिखते हुए घरेलू बोध पर विशेष ध्यान दिया। अध्यक्षता दयानिधि मिश्र ने की। बीएचयू के प्रो. प्रभाकर सिंह, सरस्वती पत्रिका के संपादक रबिनंदनसिंह, असम विवि के प्रो. शीतांशु, साकेत पीजी कालेज मुंबई के पूर्व बब प्राचार्य इंदीवर, कवयित्री निशि क उपाध्याय, बीएचयू की डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने भी विचार रखे। इस मौके पर प्रो. राजमुनि, प्रो. रामाश्रय सिंह, प्रो. अनुकूल चंद राय, डॉ. अविनाश कुमार सिंह, डॉ. विजय रंजन, जनमेजय, हनुमान राम, वरुणा देवी, प्रतिभा, स्तुति राय, प्रज्ञा पाण्डेय आदि रहीं।