बिहार राज्य के मुजफ्फरपुर जिला से किरण देवी जीविका मोबाइल वाणी के माध्यम से तोरई की खेती कैसे करें इसकी जानकारी देते हुए बताया कि तोरई को लतादार सब्जियों में गिना जाता है. जिसकी खेती मुख्य रूप से नकदी फसल के रूप में की जाती है. इसको कई जगहों पर झिंग्गी, तोरी और तोरई  के नाम से भी जाना जाता है. इसका पौधा बेल ( लता ) के रूप में फैलता है. जिस पर पीले रंग के फूल खिलते हैं. इसके फूलों में नर और मादा पुष्प अलग अलग वक्त पर खिलते हैं. इन पुष्पों पर लगने वाले फलों का ज्यादातर उपयोग सब्जी बनाने में किया जाता है.  उन्होंने यह भी बताया कि तोरई की खेती मुख्य रूप से तो बारिश के मौसम में की जाता है. लेकिन इसको खरीफ की फसल के साथ भी लगाया जा सकता हैं. इसके पौधे को विकास करने के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए. तोरई की खेती के लिए कार्बनिक पदार्थों से भरपूर उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक पैदावार लेने के लिए इसकी खेती उचित जल निकासी वाली दोमट मिट्टी में करनी चाहिए. उदासीन ( सामान्य ) पी.एच. मान वाली भूमि में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है.तोरई की खेती के लिए खेत को अच्छे से तैयार किया जाना चाहिए. इसके लिए शुरुआत में खेत की मिट्टी पलटने वाले हलों से गहरी जुताई कर तेज धूप लगने के लिए कुछ दिन तक खेत को खुला छोड़ दें. उसके बाद खेत में पुरानी गोबर की खाद को डालकर उसे मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पाटा लगाकर उसे समतल बना लें. खेत को समतल बनाने के बाद उसमें उचित दूरी रखते हुए धोरेनुमा क्यारी तैयार कर लें.इसके बीजों की रोपाई खेत में तैयार की गई धोरेनुमा क्यारियों में की जाती है. क्यारी में इसके बीजों को मेड के अंदर की तरफ डेढ़ से दो फिट की दूरी पर उगाते हैं. इसके पौधे जमीन की सतह पर फैलकर बढ़ते हैं. इस कारण क्यारिओं को बनाते वक्त क्यारियों के बीच लगभग 3 से 4 मीटर की दूरी बनाकर रखनी चाहिए. ताकि बेल आसानी से फैलकर अच्छे से विकास कर सके. तोरई के बीजों की खेत में रोपाई बारिश और खरीफ के मौसम के आधार पर अलग अलग वक्त में की जाती है. बारिश के मौसम में फल लेने के लिए इसके बीजों की रोपाई जनवरी माह में की जाती है. जबकि खरीफ की फसल के रूप में इसकी पैदावार लेने के लिए इसकी रोपाई जून के महीने में की जाती है. तोरई के पौधों को भी बाकी बेल वाली की फसलों की तरह अधिक उर्वरक की आवश्यकता होती है. इसके लिए शुरुआत में खेत की तैयारी के वक्त लगभग 12 से 15 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालनी चाहिए. गोबर की खाद की जगह जैविक खाद के रूप में किसान भाई कम्पोस्ट खाद का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में एन.पी.के. की 100 से 125 किलो मात्रा को खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिडक दें. उसके बाद पौधों के विकास के दौरान लगभग 15 किलो यूरिया की मात्रा को पौधों की तीसरी सिंचाई के साथ देना चाहिए. जिससे पौधे अच्छे से विकसित होते हैं.