सोमवार 5 अप्रैल को बिहार का सासाराम शहर अचानक भड़क उठा.शहर के कोचिंग संस्थानों में पढ़ रहे बच्चे सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. पुलिस ने रोकने का प्रयास किया तो मामला और गरमा गया. ये सारा गुस्सा इसलिए था क्योंकि सरकार बिहार में कोचिंग संस्थानों को बंद किए हुए है. वैसे ये फैसला देश के बाकी राज्यों के लिए भी लिया गया है
जब किसान हाथों में कुदाल लेकर खेतों में उतरता है तो धरती हरी—भरी हो जाती है और जब वही किसान हाथ में झंडे लिए सड़कों पर उतरता है तो सरकार हिल जाती हैं. ये जमी कई किसान आंदोलन देख चुकी है पर आज जो हो रहा है वो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ! हमारा किसान, हमारी ही सरकार से इतना निराश कभी नहीं था, जितना आज है... क्या आप उसके साथ हैं? अगर हां तो अपनी बात रिकॉर्ड करें, फोन में नम्बर 3 दबाकर.
कृषि विधेयक के खिलाफ एक बार फिर किसानों का रोष आक्रोश में बदल रहा है. वे गांवों से निकलकर दिल्ली कूच करने की तैयारी में है.. हम आप से जानना चाहते हैं कि आप किसके साथ हैं?
रफ़ी की डायरी: कड़ी संख्या दो. अजय: नमस्कार श्रोताओं ‘रफी की डायरी’ में आपका स्वागत है। मैं हूं अजय। आइए जानते हैं आज रफी जी अपने अनुभवों से तैयार की गई इस डायरी का कौन सा पन्ना खोलते हैं ? रफ़ी: ये पन्ना देश के अन्नदाता किसानों के दर्द को बयान करता है। अभी दिल्ली में एक बड़ी किसान रैली हुई थी. मोबाईल वाणी की रिपोर्टिंग के सिलसिले में रैली की हकीक़त से रु-ब-रू हुआ. बातें दिल को मथने लगी और फिर डायरी में उतरती चली गयी। अजय: अरे वाह! मजदूरों के बीच अचानक किसानों की चर्चा ले आये आप तो! रफी: उस सुबह में कोई अजीब बात नहीं थी अजय जी. दिल्ली ने कई तख़्त पलटते देखें हैं. पर हाँ सुबह की धूप में खेतों से चल कर आये पैरों की गरमी थी. उनके सीने में दबी आग से मौसम बदल गया था. अलग-अलग अंदाज़, रंग-रूप और मज़हब के लोग थे। इन्हीं मुख्तलिफ अंदाजों का इस्तेमाल कर हुक्मरान उनपर हुकूमत करते आये थे. उनकी आवाज़ उन हुक्मरानों के महलों के करीब आ गयी थी. लोगों की राह रोकने और मोड़ने के लिए जगह जगह बैरिकेड लगे थे। नारे अपनी गलतियों पर पछतावे की तरह थे. चुनाव और पछतावा- इस चक्र को तोड़ने के लिए ये लोग दिल्ली आये थे. सरकारें हमेशा इंसानियत को धोखा नहीं दे सकती. अजय: हूँ...कोई विशेष घटना ? रफी: मुख्तलिफ जुबान वाली एक महिला थी. शायद कर्नाटक से थी. किसान होने की वजह से जो लोग मौत के आगोश में चले गए थे यह महिला उनको आवाज़ दे रही थी. भाषा का भेद ख़तम हो गया था. उसकी आवाज़ में एक तड़प थी. पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तड़प थी. वो तड़प रही थी इस बात से की जिनके कहने पर वो इतनी दूर चल कर दिल्ली आई थी, उन्होंने अपने मंच पर नेताओं को बुला लिया है. ऐसे नेता जो किसानों के हत्यारे हैं. फिर से वोट की हत्यारी राजनीति! यह नेताओं की रैली हो गयी थी और आने वाले लोग वोट-बैंक! वह महिला भीड़ में जाकर हर किसी से कह रही थी कि उतारो इन नेताओं को मंच से. इस झूठ का बायकॉट करो. सच का साथ दो. आओ मिल जुल कर इस झूठ के चेहरे से नकाब खींच ले. वह महिला इस किसान रैली की चीख थी. अजय: तो क्या कोई भी संगठन उसके साथ नहीं आया? क्या सब चुप-चाप तमाशा देखते रहे? रफ़ी: कैसी अजीब बात है. सब चुप हो गए थे. मैंने सुना सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर भी अचानक भीड़ से निकलते-निकलते कहती गयी- अब यूनियन वाले ही हमें धोखा देते हैं तो हम क्या करें? लोग उधर राहुल गांधी के साथ सेल्फी लेने में मस्त थे. अजय: तो इस तरह किसान रैली भी राजनिती की भेंट चढ़ गई। बहुत-बहुत शुक्रिया रफ़ी. आपकी डायरी तो हकीक़त का आइना है! तो श्रोताओं कैसी लगी रफ़ी की डायरी? और हमें यह भी बताएं कि किसानों और मजदूरों की स्थिति में आप क्या समानता या फर्क देखते हैं? नंबर तीन दबा कर आप अपनी बात कह सकते हैं। रफ़ी की डायरी के साथ हम फिर हाज़िर होंगे. सुनना मत भूलियेगा. शुक्रिया.
