कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों की व्यवस्था सुधारने के लाख दावे किए जाएं पर हकीकत कुछ और ही है। कस्तूरबा आवासीय विद्यालयों में अध्यनरत छात्राओं के रहन सहन, खान पान और शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त रखने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, बावजूद इसके समुचित लाभ छात्राओं को ससमय नहीं मिल पा रहा है। शासन की योजनाओं को धरातल पर लाने के लिए जिम्मेदार कितने लापरवाह है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आठ माह बाद भी छात्राओं को स्टेशनरी नहीं मिल पाई है। नियमानुसार सत्र शुरू होने से पहले कस्तूरबा विद्यालय में अध्ययनरत छात्राओं के लिए कॉपी, पेंसिल, इरेजर, टेस्ट कॉपी सहित अन्य आवश्यक सामग्री की व्यवस्था हो जानी चाहिए। दुर्व्यवस्था का आलम यह है कि अब तक इसकी टेंडर प्रक्रिया भी पूरी नहीं की जा सकी है। ऐसी स्थिति में कस्तूरबा आवासीय विद्यालयों की छात्राएं फटी पुरानी या अपने स्तर से कापियों की व्यवस्था कर लिखने पढ़ने को मजबूर हैं। हैरत की बात तो यह है की टेंडर प्रक्रिया अधर में लटकने की वजह से ब्लैक बोर्ड पर लिखने के लिए चाक तक की व्यवस्था शिक्षकों को स्वयं के स्तर से करनी पड़ रही है। बावजूद अधिकारी ऑल इज वेल बताकर एक दूसरे की पीठ थपथपाने में लगे हैं।
