पक्ष और विपक्ष की चर्चा सबसे ज्यादा राजनीतिक संदर्भ में की जाती है। दोनों एक-दूसरे की न केवल कमियां खोजते हैं, बल्कि दूसरे पर प्रहार भी करते हैं। लेकिन इन दोनों तरह की धारणाएं हमारे मन के अंदर भी हैं। एक समय पर पक्ष आता है और पलक झपकते विपक्ष भी खड़ा हो जाता है। अपने ही अंदर के अनुभवों का इतना बड़ा संसार है कि हमें और कहीं जाने व जरूरत नहीं, लेकिन हम हैं कि मारे-मारे फिरने लगते हैं। जब भी संकट में पड़ते हैं, तो घबराकर हल ढूंढने की बजाय किसी और के दरवाजे पर दस्तक देने लगते हैं।
