कुल मिलाकर, महिलाओं के लिए संयुक्त स्वामित्व सिर्फ़ काग़ज़ी नियम नहीं है, बल्कि समाज को बदलने का एक मज़बूत ज़रिया है। यह महिलाओं को मज़बूत बनाता है, परिवार में संतुलन लाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए बराबरी की एक अच्छी मिसाल पेश करता है। महिलाओं को ज़मीन और संपत्ति में बराबर हक़ देना एक बेहतर और न्यायपूर्ण समाज की ओर बड़ा कदम है। तब तक आप हमें बताइए कि , *--- क्या आपके परिवार की ज़मीन या घर महिलाओं के नाम पर भी संयुक्त रूप से दर्ज है? *--- अगर नहीं, तो क्या आप संपत्ति में बेटियों और बहुओं को बराबर अधिकार देने पर विचार करेंगे? *--- क्या आप मानते हैं कि महिलाओं को ज़मीन का अधिकार मिलने से परिवार ज़्यादा सुरक्षित और मज़बूत होता है? *--- क्या अगली पीढ़ी को बराबरी की सीख देने के लिए आप संयुक्त स्वामित्व अपनाना चाहेंगे?

अधिकांश व्यक्तिगत पट्टे पुरुषों के नाम पर होते हैं. सामुदायिक अधिकारों में भी महिलाओं को भी कम प्रतिनिधित्व दिया जाता है. इसके चलते महिलाएं केवल खेत मजदूर बनकर रह जाती हैं. महिलाओं को इसका नुकसान यह होता है कि बैंक, बीमा तथा दूसरी सरकारी सहायता का लाभ नहीं उठा पाती है, जो उनके लिए चलाई जा रही हैं.

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पति की मृत्यु के बाद विधवा का उसकी ज़मीन पर अधिकार कोई दया नहीं, बल्कि उसका कानूनी हक़ है। ज़रूरत इस बात की है कि क़ानून की जानकारी, प्रशासनिक सहयोग और सामाजिक समर्थन तीनों एक साथ मिलें। तभी विधवाओं के लिए “क़ानून में अधिकार” वास्तव में “ज़मीन पर अधिकार” बन पाएगा। तब तक आप हमें बताइए कि , *--- क्या आपके गांव/मोहल्ले में विधवाओं के नाम ज़मीन का म्यूटेशन आसानी से होता है? *--- पंचायत या स्थानीय नेता विधवा अधिकारों की रक्षा में किस तरह की भूमिका निभा रहे हैं? *--- बेदखली के मामलों में प्रशासन कितनी जल्दी कार्रवाई करता है? *--- और क्या कानूनी सहायता केंद्र गांवों तक प्रभावी ढंग से पहुँच पा रहे हैं?

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