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बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में, सत्तू एक लोकप्रिय खाद्य पदार्थ है, जहाँ ग्रामीण और शहरी इलाकों में लोग गर्मियों के दौरान सत्तू के शरबत पीते हैं वहीँ इससे लोकप्रिय लिटी-चोखा और कचौरी सहित कई पारंपरिक व्यंजन भी बनाये जाते हैं। एक समय था जब सत्तू को गरीब आदमी के मुख्य भोजन के रूप में जाना जाता था,लेकिन आज के दौर में सत्तू अब महंगा हो चूका है और ब्रांडेड सत्तू तो 150 रुपये प्रति किलोग्राम में बेचा जाता है।तो श्रोताओं ,आज हम बात करेंगे नालंदा की ग्रामीण महिलाओ के बारे में,जो परम्परिक तरीके से सातु पीस कर स्वयं के लिए आजीविका और समाज को एक स्वस्थ विकल्प प्रदान कर रही है।नालंदा जिले के हरनौत प्रशासनिक खंड में नेहुसा गांव की एक दर्जन से अधिक महिलाओं के साथ गाँव की ही सुनीता देवी ने एक पारंपरिक जांता पत्थर का इस्तेमाल कर, सत्तू बनाने का काम शुरू किया और आज वो इज़्ज़त के साथ पैसे कमाती हैं।नालंदा में जीविका जिला के प्रोजेक्ट मैनेजर उमा शंकर भगत ने कहा कि जांता से सत्तू बनाने से कई महिलाओं के लिए आजीविका होती है।साथ ही उन्होंने कहा कि "जांता सत्तू तैयार करने का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को काम मुहैया कराने और शहरी लोगों को शुद्ध और स्वस्थ जटा सत्तू की आपूर्ति करना है,नाबार्ड की जीवनरक्षक और उद्यम विकास कार्यक्रम (एलईपी) के अंतर्गत, लगभग 150 एसएचजी यानी स्वयं सहयता समूहों के सदस्यों को माधोपुर किसान उत्पादक कंपनी में चंडी प्रशासनिक ब्लॉक के अनंतपुर गांव में जांता सत्तू बनाने में प्रशिक्षित किया गया और आज जांता सत्तू को बिहार में नालंदा सत्तू के नाम से ब्रांडेड किया गया है।

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