ज्योति कुमारी जी सिकंदरा जमुई से मोबाइल वाणी के माध्यम से बताती है कि शादी एक सामाजिक समारोह है। अकसर देखा जाता है कि शादियों में बिना जरुरत के अनुसार पैसा खर्च करते है,इसके लिए वे कर्ज लेने से भी नहीं चूकते है। लोग शादी ऐसे धूम धाम से करना चाहते है कि हमेशा यद् रख सके। हलाकि यह स्वाभाविक मानवीय इक्षा है ,लेकिन यह इक्षा बेकाबू हो जाती है। लोग अपनी चादर के बहार पाव पसारने लगते है। लोग शादियों में इतना खर्च करते है कि उनका जीवन चौपट हो जाता है,कर्ज चुकाना कठिन हो जाता है। हर आदमी अपनी तुलना अपने से ज्यादा मालदार लोगों से करने लगता है ,दूसरों की देखा -देखि लोग अंधाधुन खर्च करते है। इस खर्च को पूरा करने के लिए लोग या तो कर्ज ले लेते है या अपनी जमीं जायजात बेच देते है और बईमान लोग भर्ष्टाचार में दुब जाते है