महिलाओं की कविता सुबह होती है , शाम होती है , बुढ़ापे में होती है , अँधेरी रातों में हम खुद को इतना नहीं पाते हैं । ऐसा न होने का नुकसान होता है कि सुबह होती है , फिर वह टूट जाती है , खोया हुआ जीवन उगता है , चलता है , नई सांसों के साथ बढ़ता है , नया आराम , सुबह भी नई होती है । जैसा कि एक नई शाम की खोज भी है , एक शाम जो अपनी तरह ही खास है , और एक सुरम्य जूकून । खदीर बेईं थाईपाई । कोई और एक दूर का सितारा ।
